हम क्या थे और क्या हो सकते थे
रिश्ते वो धागे थे जो उँगलियों में लिपटे थे,
न तोड़े तो उलझे, न छोड़े तो कसते थे।
हम दो किनारे थे एक ही नदी के यारो,
मिलते कहाँ थे — बस दूर से देखते थे।
यादें वो खिड़की हैं जिन्हें बंद नहीं होती,
रात को हवा आती है, पर्दे हिलते हैं।
वो जो लम्हे थे — अब भी मेज पर धरे हैं,
छूने से बिखरते हैं, छोड़ने से तड़पते हैं।
बारिश आई तो तुम्हारी खुशबू आई साथ में,
मौसम वही था, मगर तुम नहीं थे।
आसमान ने पूछा — कहाँ गए वो लोग?
बादल बोले — कुछ रिश्ते अधूरे ही जीते हैं।
जिंदगी का रंगमंच बड़ा बेरहम है जानाँ —
हम जो हो सकते थे, वो किरदार न मिले।
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