हम क्या थे और क्या हो सकते थे

हम क्या थे और क्या हो सकते थे

रिश्ते वो धागे थे जो उँगलियों में लिपटे थे,

न तोड़े तो उलझे, न छोड़े तो कसते थे।

हम दो किनारे थे एक ही नदी के यारो,

मिलते कहाँ थे — बस दूर से देखते थे।

यादें वो खिड़की हैं जिन्हें बंद नहीं होती,

रात को हवा आती है, पर्दे हिलते हैं।

वो जो लम्हे थे — अब भी मेज पर धरे हैं,

छूने से बिखरते हैं, छोड़ने से तड़पते हैं।

बारिश आई तो तुम्हारी खुशबू आई साथ में,

मौसम वही था, मगर तुम नहीं थे।

आसमान ने पूछा — कहाँ गए वो लोग?

बादल बोले — कुछ रिश्ते अधूरे ही जीते हैं।

जिंदगी का रंगमंच बड़ा बेरहम है जानाँ —

हम जो हो सकते थे, वो किरदार न मिले।

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