मिट्टी एक, नाम अलग

— एक प्यार जो था, एक दीवार जो नहीं होनी चाहिए थी —

मिट्टी तो एक ही है —

पर लोगों ने उसमें

लकीरें खींच दीं।

और कहा —

“इस तरफ तुम, उस तरफ वो।”

प्यार ने पूछा — “क्यों?”

समाज चुप रहा।

पर दीवार खड़ी रही।

जब दो नाम एक छत के नीचे मिले

काशी के एक पुराने मोहल्ले में एक सरकारी दफ्तर था। वहाँ सुबह नौ बजे से फाइलें चलती थीं और चाय की तीन बार चुस्की होती थी।

वहीं काम करते थे — रोहन और सविता।

रोहन — ऊँची जाति का। घर में माँ-बाप, दादी, और एक पुरानी हवेली जिसकी दीवारों पर वंशावली टँगी थी।

सविता — दलित परिवार से। माँ आँगनबाड़ी में काम करती थीं, पिता खेतों में। सविता पहली थी अपने परिवार में जो सरकारी नौकरी में आई थी।

दोनों के बीच पहले शब्द हुए — एक टूटे हुए स्टेपलर पर। सविता की फाइल बिखर गई थी, रोहन ने उठाई थी। बस इतना।

पर उस “बस इतने” में कुछ था।

जो रोज़ थोड़ा-थोड़ा बड़ा होता गया।

वो बातें जो चाय के साथ होती थीं

दफ्तर की छत पर एक पुरानी पानी की टंकी थी। उसके बगल में दो कुर्सियाँ किसी ने रख दी थीं — शायद इसीलिए, कि कोई वहाँ बैठे।

रोहन और सविता वहाँ बैठने लगे — लंच में। पहले इत्तेफाक से, फिर आदत से।

सविता किताबें पढ़ती थी — अम्बेडकर, कबीर, प्रेमचंद। रोहन सुनता था — पहले शिष्टाचार से, फिर दिलचस्पी से, फिर ऐसे जैसे हर शब्द उसके भीतर कहीं उतरता जा रहा हो।

“तुमने कभी सोचा,” सविता ने एक दिन पूछा था, “कि जो जाति तुम्हें ऊपर रखती है — वो मुझे नीचे रखने से बनती है?”

रोहन के पास जवाब नहीं था। पर उस सवाल ने उसके भीतर कुछ हिलाया था।

वो रात वो सो नहीं पाया था।

और सुबह जब दफ्तर आया, तो सविता की तरफ देखने का तरीका बदल गया था। वो अब उसे देखता था — सिर्फ एक सहकर्मी की तरह नहीं।

एक इंसान की तरह। एक पूरे इंसान की तरह।

जो कहा नहीं गया, वो सबसे ज़्यादा था

महीने गुज़रे। दोनों जानते थे — पर कहते नहीं थे।

यह प्यार था। पर इस प्यार का नाम लेना — एक डर था।

सविता जानती थी कि उसके घर में माँ क्या कहेगी — “बेटा, ऊँची जाति वाले हमें अपनाते नहीं, चाहे जितना मुस्कुराएँ।”

रोहन जानता था कि उसकी दादी क्या कहेगी — वो जो कहती, वो यहाँ लिखना ठीक नहीं।

एक दिन बारिश में दफ्तर से निकलते हुए, छाता एक था — रोहन का। सविता भीग रही थी।

रोहन ने छाता उसकी तरफ बढ़ाया।

सविता ने कहा, “रहने दो।”

रोहन ने कहा, “नहीं।”

दोनों एक छाते के नीचे खड़े रहे — बस दो मिनट। पर उन दो मिनटों में जो हुआ, वो किसी किताब में नहीं लिखा जाता।

कुछ लम्हे — बस महसूस होते हैं।

जब दीवार बोली

रोहन ने घर में बताया।

एक शाम, खाने के बाद। धीरे से। जैसे काँच रखते हैं।

माँ चुप रहीं — पहले। फिर रोईं। फिर बोलीं — “बेटा, हम समझते हैं। पर समाज नहीं समझेगा। तुम्हारी नौकरी है, हमारी इज़्ज़त है। बाप की उम्र है, दादी की साँसें हैं। सोचो।”

दादी ने सिर्फ इतना कहा — “खानदान मत मिटाओ।”

रोहन उस रात बाहर बैठा रहा। आसमान में तारे थे। उसने सोचा — इन तारों को कोई जाति नहीं होती। बारिश को कोई जाति नहीं होती। हवा को कोई जाति नहीं होती।

सिर्फ इंसान को होती है।

और यही सबसे बड़ा दुख है।

सविता का फैसला

सविता को पता चला — किसी ने बता दिया।

वो दूसरे दिन छत पर नहीं गई। रोहन गया — अकेला। कुर्सियाँ वहीं थीं, चाय नहीं थी।

तीसरे दिन सविता आई। बैठी। बोली —

“रोहन, मैं जानती हूँ तुम क्या महसूस करते हो। मैं भी महसूस करती हूँ। पर हम दोनों जानते हैं — यह दुनिया अभी इतनी बड़ी नहीं हुई।”

“मैं तैयार हूँ।” — रोहन ने कहा।

“मैं नहीं।” — सविता ने कहा। और उसकी आँखें भरी थीं।

“मेरी माँ ने ज़िन्दगी भर लड़ाई लड़ी है — भूख से, अपमान से, समाज से। मैं उन्हें और लड़ाई नहीं दे सकती। वो थकी हुई हैं, रोहन। मैं उनकी थकान नहीं बढ़ा सकती।”

रोहन कुछ नहीं बोला।

क्योंकि वो जानता था — सविता गलत नहीं थी।

और यही सबसे कठिन बात थी।

आखिरी बात

सविता का ट्रांसफर हो गया — दूसरे जिले में। उसने खुद अर्जी दी थी।

जाने से एक दिन पहले, छत पर, आखिरी बार।

रोहन ने एक किताब दी — “अम्बेडकर की आत्मकथा।” पहले पन्ने पर लिखा था —

“तुमने मुझे वो देखना सिखाया जो मैं देखना नहीं चाहता था। यह सबसे बड़ा तोहफा है। — रोहन”

सविता ने किताब ली। लंबे वक़्त तक देखती रही।

फिर बोली — “रोहन, एक बात पूछूँ?”

“हाँ।”

“अगर दुनिया अलग होती — तो?”

रोहन मुस्कुराया। दर्द भरी मुस्कुराहट।

“तो हम शायद बहुत खुश होते।”

सविता उठी। जाने लगी। दरवाज़े पर रुकी। पीछे मुड़ी।

“दुनिया को बदलो, रोहन। मेरे लिए नहीं — अपने लिए। ताकि अगली बार किसी रोहन और सविता को यह फैसला न करना पड़े।”

और वो चली गई।

रोहन वहीं खड़ा रहा। आसमान में बादल थे। बारिश आने वाली थी।

दर्द के साथ सुकून

साल बाद।

रोहन अब भी उसी दफ्तर में है। पर कुछ बदल गया है उसमें।

उसने मोहल्ले में एक छोटा पुस्तकालय खोला है — जहाँ सब आ सकते हैं। जाति नहीं पूछी जाती। नाम नहीं पूछा जाता। बस किताब माँगो और बैठ जाओ।

दादी नाराज़ हैं। माँ अब चुप हैं — पर देखती हैं।

एक दिन माँ ने पूछा — “वो लड़की याद आती है?”

“हाँ।” — रोहन ने सच कहा।

“दुख होता है?”

“हाँ। पर वो गलत नहीं थी।”

माँ ने कुछ नहीं कहा। पर उनकी आँखों में कुछ था — शायद समझ, शायद पछतावा।

रोहन को सविता का एक संदेश आया था — महीनों बाद। बस इतना —

“पुस्तकालय के बारे में सुना। अच्छा किया।”

रोहन ने वो संदेश पढ़ा। और रोया।

पर वो रोना — टूटने का नहीं था। वो रोना उस दर्द का था जो अब सुकून बन चुका था।

क्योंकि जो प्यार था — वो सच था। और जो दीवार थी — वो गलत थी। और यह जानना — यह स्वीकार करना — यही सबसे बड़ा हौसला है।

कि हम बदल सकते हैं। धीरे-धीरे। एक पुस्तकालय से। एक किताब से। एक इंसान से।

सविता ने कहा था — दुनिया को बदलो।

रोहन ने शुरुआत कर दी थी।

अंत — या एक शुरुआत

प्यार में जाति नहीं होती —

पर दुनिया में होती है।

और यही वो दर्द है

जो न रोने देता है,

न भूलने देता है।

पर एक दिन —

जब कोई बच्चा उस पुस्तकालय में जाएगा

और किताब उठाएगा —

तो रोहन और सविता की कहानी

उसमें जीती रहेगी।

मिट्टी एक थी।

मिट्टी एक रहेगी।

लकीरें — इंसान ने खींची थीं।

इंसान ही मिटाएगा।

— समाप्त —

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