हम क्या थे और क्या हो सकते थे
हम क्या थे और क्या हो सकते थे रिश्ते वो धागे थे जो उँगलियों में लिपटे थे, न तोड़े तो उलझे, न छोड़े तो कसते थे। हम दो किनारे थे एक ही नदी के यारो, मिलते कहाँ थे — बस दूर से देखते थे। यादें वो खिड़की हैं जिन्हें बंद नहीं होती, रात को हवा … Read more